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Saturday, December 22, 2012

काश

काश  हम इतने अलग ना होते 
 यु ही तुम  को बीच  राह में ना  खोते 
चलना  तो चाहा  था  बहुत दूर साथ 
पर  यु हम थक कर ना सोते ।

बेवजाह दूरिया और दूर ले गयी 
अरसे भर की तमन्ना भी इंतज़ार से रो गयी 
ढूँढा तो बहुत था उनको हर चोराहे  पर 
पर शायद निराश नन्ही ख्वाहिशे भी खो गयी ।

सब कुछ पाना कब जरूरी है 
पर ज़िद की ऐसी क्या मजबूरी है 
और अब तो खो गए है हम भी 
किस्मत की शायद यही मंजूरी हैं ।

Tuesday, October 09, 2012

ऐ दिल ले चल कहीं

ऐ  दिल ले चल कहीं 
जहा भीड़ की परछाई भी नहीं 
और ये तन्हाई भी नहीं
ले चल मुझे वहा बस 
जहा अंगड़ाई लेती ख़ामोशी भी नहीं 
और गूंजते ठहाके भी नहीं 
 ऐ दिल मेरे दिल ले चल कही 
बहुत दूर कहीं.........। 

Saturday, November 19, 2011

पागल परिंदे










बस चंद लम्हे आराम और करने दो
तपती धूप से शाम होने दो
दिल मे जो ख्वाहिशे है बेतहाशा 
कुछ ख्वाहिशे तो पूरी करने दो|

डरावना सा यह लंबा सफ़र है 
मुसाफिर भी नहीं कोई साथ है
और काली घटा है फैली चारो ओर 
पंख है थके और नयना भी हैरान है|

होठ चाहे कितना भी कहारयेगे 
कुछ और दूर तो चले ही जाएगे
पागल परिंदे है हम आवारा
इन वादियो को पीछे छोड जाएगे||

Tuesday, June 21, 2011

स्वपन

बचैनी में मचलती उस तन्हाई में
एक पीर जगती है ऐसे
शांत समंदर के पानी में
एक विकराल लहर उठी हो जैसे|

टूटेगा
यह तट भी विरह की लहरों से
सुना तो था कभी ऐसे
पर चन्द उन्मादित लहरों के अजमाने से
भला यह तट अपना सिरा छोड़ेगा कैसे|

ऊंघती सिमटती उन अंगङाईयो में
एक टीस मचती है ऐसे
कबसे बेबसी का पिंजरा तोड़
पंख फ़ैलाने को आतुर हो एक पंछी जैसे|

बाते है जरूर कुछ ऐसी जहन में
जो बस भूलती नहीं ऐसे
कब से सोया एक डरावना स्वपन
नींद से जगाने को उन्मुख हो जैसे|

-गजेन्द्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Wednesday, June 08, 2011

स्मृति

कतरा कतरा यू ही वक़्त गुजर जाएगा
बीता हर एक पल याद आएगा
चला था जिन रहो पर बदहवास
वो हर कदम स्मृति को विकल कर जाएगा|

विषैले काँटे भी थे खूब रहो पर
बेजान कंकर पथर भी थे भर कर
बंजारो में बस बेआलमी में दिल लगा लिया
और कई बार गिरा भी थक हार कर|

बहुत हसीं नज़ारे भी मिले
झीलमिल सितारे भी मिले
कोसो फैली तन्हाई में भी
कुछ दूर हमदम प्यारे मिले

पर कुछ दूर तो चले आये है
शायद कुछ ही दूर और जाना है
मीलो चल चुका हूँ बेमानी रहो पर
अब तो बस मंज़िल को पाना है|

Friday, June 25, 2010

A Shabby Shrub in a Deserted Desert















There in the far deserted desert
Was lying a shabbily grown shrub
Withered and burnt in the heat
It wasn't elegant or marvellous
Neither was it beautiful nor was it neat
It was just a shabbily grown shrub
Only born to bear the brunt of the heat


Passers looked but no one noticed
All were in a hurry to cover the distance
And cared least for a shrub in a wasteland!
Lying all alone in the desolated desert
It only hoped it will rain in the end
And by its side it will have a forest
Instead of miles of just barren sand


Clouds did come but least they cared
As quickly they also wanted to reach
To the mountain range where few dared
Why waste labours on an untidy shrub
When a lush green forest could be gazed
So it rained in an already quenched forest
While the thirsty shrub helplessly stared

Friday, January 15, 2010

खोया सवेरा

अँधेरे की काल कोठरी को चीर
आसमान की तख़्ती को पोतने को
रोज तडके निकलता वो लाल गुबारा
सवेरे सुप्रभातम बजाता मंदिर का भोम्पु
और मिटी की सौंधी खुशबु में सराबोर
पीपनि से चूल्हा धुकाती घर की विधाता
बाड़े के खूंटे से बँधी जुगाली करती गाय
और रात भर की भूख से व्याकुल
उछल उछल घंटी हिलाता वो नटखट बछड़ा
रोज की भागमभाग मे जाने कहा खो गया सब
जागे है रात भर की दिन की लालिमा नज़र आती नहीं
टाइलो मे खो गयी है मिट्टी की महक कहीं
गाय की जगह दूध की थैली ने ले ली है
अँग्रेज़ी गानो की धुन मे मशगूल है सब
सुप्रभातम किसी को भाता नहीं है

Saturday, December 19, 2009

हक़ीक़त

वोह देखो चबूतरे पर खड़ी शर्मसार हक़ीक़त
नाकामी की चोट खा सिसकती हकीक़त
थक हार बोह्झिल हो खुद मे सिमटती हकीक़त
हो कर बेजार इस अपने नसीब की बेवफाई से
हक़ीक़ती मुकाम के लिए तरसती बेबस हकीक़त

अरमानो की बंद कोठरी मे पड़ी बदहवास हक़ीक़त
किस्मत के वहशी पिंजरे मे क़ैद हक़िक़त
रोजमरा की हाथापाई से लहुलुहान होती हक़िक़त
छुड़ा खुद को इस कुदरत के दरिंदे पंजे से
हक़िक़त बनने को मचलती हक़िक़त

- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Saturday, July 18, 2009

मेरी गाड़ी छुटी जा रही थी

दूर से देख रहा था उसे
पर वो और भी दूर जा रही थी
मानो सीटी बजा बजा कर मुझे चिड़ा रही थी
कोशिश तो की बहुत मैंने उस तक पहुँचने की
पर फिर भी मेरी ट्रेन छुटी जा रही थी|

नहीं मिलेगी वो किसी अगले प्लेटफोर्म पर
यह तो मुसाफिर के दिल ने भी जाना है
पर एक मजबूर मुसाफिर को तो बस चलते जाना है
चाहे गाड़ी छुटने की टीस रह जायेगी हमेशा के लिए
पर अगली ट्रेन पकड़ अपनी मंजिल तक पहुँच जाना है|

गाड़ी को कहा होती है परवाह अधर में अटके मुसाफिर की
उसे भी तो बस बिन रुके चलते जाना होता है
मुसाफिर के लिए छूटती गाड़ी की बैचैनी को भुलाना नहीं आसान होता है
पर गाड़ी को कहा चिंता है उस मुसाफिर की बेचैनी क़ी
उसे तो बस अपने चुनिंदा मुसाफिरो के साथ चलते जाना होता है|

किसी रोज एक दिन जब एक ऐसा स्टेशन आएगा
सब मुसाफिर छोड़ गाड़ी को बढ़ जाएगे अपनी मंज़िल की और
और जब गाड़ी लौटेगी अकेले अपने गंतव्य की और
शायद सोचेगी वो भी उस बिछड़े मुसाफिर के बारे मे
जो शायद चलता उसके साथ अंतिम पड़ाव की और|

- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Friday, June 19, 2009

साथ के मुसाफिर

चले तो थे साथ बहुत दूर तक
पर अब और दूर जा ना सकेगे
शायद इतना ही होना था सफर साथ में
जो मंजिल की झलक भी पा ना सकेगे|

ओ साथ के मुसाफिर यु ही भूल ना जाना
इन गलियों को जिन पर तू चला था
माना तीन दिन में भूलना तेरी आदत है
पर अपने निशाँ इन रहो पर जरूर छोड़ जाना|

बेखबरी और आवारगी के आलम में
जब भी फ़िर गुजरूँगा उनही गलियों से
देख वक्त के साथ शीण होते उन निशानों को
शायद याद कर लूँगा साथ कटे उस सफर को|


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Thursday, March 26, 2009

शायद इस रात कि सुबह नहीं।

दूर तक फैला है अँधेरा
रौशनी क्यों नजर आती नहीं
क्या मीलो लंबी है यह सुरंग
जो तारों कि भी झिलमिल नजर आती नहीं
कहते है रात के बाद दिन आता है
पर शायद इस रात कि सुबह नहीं।

व्यर्थ ही चला जा रह हूँ मैं
कहा है जाना पता नहीं
थका हारा हूँ मैं कब से
कोई आश्रय क्यों नजर आता नहीं
कहते है रात के बाद दिन आता है
पर शायद इस रात कि सुबह नहीं।

थकी है जगी है आंखें बहुत देर से
पर नींद फिर क्यों आती नहीं
गुजर गया है तूफ़ान
पर करार दिल को क्यों आता नहीं
कहते है रात के बाद दिन आता है
पर शायद इस रात कि सुबह नहीं।

कहते है जिन्दगी में सब कुछ है
पर बात इसमे क्यों नजर आती नहीं
ऐसा लगता है जीवन बेवफा है
तो मौत फिर क्यों गले लगाती नहीं
कहते है रात के बाद दिन आता है
पर शायद इस रात कि सुबह नहीं।

Sunday, March 22, 2009

ख्वाब जो ख्वाब में भी ना आया

किसी रोज़ खवाब में एक हसीं महफ़िल सजाई थी
आयेगे वोह एक दिन इस महफ़िल में ज़रुर
बस ये ही सोच कर ना जाने कब तक पलकें राह में बिछाई थी

चांदनी को भी बुलाया था सामियाने और रजाई भी मंगवाई थी
खूब बंधेगा समा जब आयेगे वोह
बस यही सोच कर जाम की प्यालिया भी भरवाई थी

किया इंतेज़ार बहुत पर उन्होंने ना आने की कसम खाई थी
बहुतो आए और जाम के प्याले खाली करचले गये
पर राह त्कते हुमने एक बूद ना होट्टो पर लगाई थी

इंतेज़ार करते करते पता ना चला कब रात ख़तम होने आई थी
व्यर्थ था ये इंतेज़ार यही सोच कर चल दिया घर की और
घर पहुँचता उससे पहले ख्वाब मेरा टूटा क्योंकि भोर होने को आई थी


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Friday, January 23, 2009

And he left me.....

I don't even know for long he was right here
Sitting with me or within me
For long he stayed in my eyes and ears
waiting for me to wake up and wipe his tears.

He knew he could never become real in daylight
So he made all his attempts to disappear
Now and then he woke me up in a restless night
As if he was having pity at his and my plight.

I was too adamant not to let him disappear in disguise
Since I didn't have the heart to see him leave
Without waking up I pressed the snooze probably twice
So that I could hold him a bit longer in my sleepy eyes.

I relentlessly persuaded and tried to stop him
I shuddered and sweated from the efforts
But he, my dream, was a creation of my own whim
And at dawn he left me alone when the light was still dim.


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Sunday, December 07, 2008

माँ कह दो उन्हें की और धमाके ना करे

माँ कह दो उन्हें की और धमाके ना करे,
मैं अभी और जीना चाहता हूँ,
थोडी सी ही जी है ज़िन्दगी मैंने,
जीवन मधु को मैं अभी और पीना चाहता हूँ|

कल जयपुर में हुए थे और आज मुंबई में,
इन धमाको की आवाज भुलाना चाहता हूँ ,
इनके बाद इतना सन्नाटा जो छा जाता है,
की मैं अपनी ही आहट से घबरा जाता हूँ|

कल पड़ोस वाली मुनिया को देखा था मैंने,
गुलाबी फ्रोक्क खरीद कर लायी थी,
ना जाने कल क्या हुआ था चौराहे पर,
आज टीवी पर खून सनी वोही फ्रोक्क दिखायी थी|

माँ कह दो उनसे की और धमाके ना करे,
मैं और यह मंजर नहीं देखना चाहता हूँ,
उनकी भी तो एक बच्ची होगी मुनिया जैसी,
मैं उसे किसी ऐसे ही धमाके में नहीं खोना चाहता हूँ |

माँ वोह सब दिखते तो अपने जैसे ही है,
फ़िर ये सब क्यों बस मैं यह जानना चाहता हूँ,
आख़िर वोह भी तो अपने जैसे ही इंसान है,
बस ये ही याद उनको दिलाना चाहता हूँ |

चारो तरफ़ भय का मंजर फैला है,
लोग बिना डर जिये बस यही चाहता हूँ,
दहशतगर्दी से इंसानियत का उत्थान नहीं होगा,
इतना सा उनको समझाना चाहता हूँ|

माँ कह दो उन्हें की और धमाके ना करे,
मैं अभी और जीना चाहता हूँ,
थोडी सी ही जी है ज़िन्दगी मैंने,
जीवन मधु को मैं अभी और पीना चाहता हूँ|


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना-

Friday, November 07, 2008

जो भी यादें है समेट लूँ उनको....

घूमती सिमटती उन तंग गलियों में
झांकते उन बेबस दरीचो से
बेफिक्र यु जाते देखा था तुमको
आवाज तो दी थी रोकने के लिए
ताकि जी भर देख सकूं तुमको|

साँस फूली थी तुम्हारी आँखे थी थकी
पर तुम्हे तो दुनिया की हर चीज़ को पाना था
और बिना रुके बहुत दूर जाना था
लंबे डग भर चलते गए तुम
अनसुनी करके मेरी आवाज बढ़ते गए तुम|

निशब्द हैरान खडा मैं उस दरीचे पर
उस तंग गली के अन्तिम छोर को निहारता रहा
और टूटे दिल से नाम तुम्हारा पुकारता रहा
चाह बस इतनी थी की चंद लम्हे भर और देख लूँ तुमको
और जो भी बची है यादें समेट लूँ उनको|

- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Tuesday, October 14, 2008

बिखरे मोतीयो से माला बनती नहीं....

टूटे शीशे कभी जुड़ते नहीं,
मुरझाये फूल कभी खिलते नहीं,
दूर से दीखते तो जरूर है
पर जमीन और आसमा कभी मिलते नहीं


बिखरे मोती से माला बनती नहीं,
खली प्यालों से मधुशाला चलती नहीं,
आंखों मैं तो सभी के रहते है
पर सिर्फ़ खवाबों से ज़िन्दगी चलती नहीं

पतझड़ में फूल खिलते नहीं,
बिन हवा पत्ते हिलते नहीं,
साथ में चलते तो है बहुत मुशाफिर
पर हमसफ़र क्यूँ राहो में मिलते नहीं|

- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Friday, August 29, 2008

Untold story of a wave hitting the shore



Broken and exhausted he left the shore
Because he knew he couldn't take it any more
When he came he was full of energy and joy
And happily he touched the shore as if it was his toy
There was something in the shore which pulled him
But he knew chances of shore being bothered were slim
He just thought about it nights and days
And tried all he could to mend his ways

Humiliated while he waited till the lights got dim
Shore was enjoying with so many others like him
Shore was always happy and indifferent to his pain
But he accepted all this misery as his gain
He was sure that one day shore will see his devotion
And will move a little bit to accommodate his motion

For long he waited but shore was too stubborn
Exasperated he shivered and took back a turn
He had already lost most of its energy and vigor
So he realized it was not wise to test further the rigor
Realizing there was no point in waiting any more
He drifted back into the sea hoping to find another shore.


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना


Monday, August 11, 2008

बिन कहे तू समझे हाल-ऐ-दिल तो क्या बात हो

डूबते तिनके को बस एक सहारा मिल जाए तो क्या बात हो,
भटकती इस लहर को किनारा मिल जाए तो क्या बात हो,
यू तो कमी नहीं है लोगों की यहाँ,
पर अनजानी भीड़ मे कोई हमारा मिल जाए तो क्या बात हो|

छितिज पर आसमा को समुद्र का छोर मिल जाए तो क्या बात हो,
और डूबते तनहा सूरज को कोई और मिल जाए तो क्या बात हो,
यु तो कमी नहीं है सितारों की यहाँ,
पर इस चकोर को अपना एक चंदा मिल जाए तो क्या बात हो|

अंधियारी ज़िन्दगी मे एक चिराग मिल जाए तो क्या बात हो,
नीरस बाग़ में एक गुल खिल जाए तो क्या बात हो,
यु तो कमी नहीं है दोस्तों की यहाँ,
पर एक आँचल का साया भी मिल जाए तो क्या बात हो|

जब तू पढ़े इसे और सुमझे मेरे दिल को तो क्या बात हो,
तेरा दिल भी धडके मेरे लिए तो क्या बात हो,
कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ तुझसे,
पर बिन कहे तू समझे हाल-ऐ-दिल तो क्या बात हो|


- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Thursday, June 12, 2008

An Aimless Wanderer

I have a feeling I have to go
To where I don't even know
Though I can still see some light
I have to be there before its dark night

It's weird you may say
But I don't have any reason to stay
Something inside makes me wanna run
And soak up this shining sun

I can feel the feelings withering
And the emotions tittering
But can't help but to keep going
To a destination without even knowing.

( My own (mis)creation )
- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना

Friday, February 23, 2007

Idle like a painted ship

Unbearable stillness in the ocean of time ,
Forcing me to create this useless rhyme,
While thinking of something elegant to write,
My brain squirms at my plight.

Sitting as idle as a painted ship,
I can't even even have a fresh water dip,
I want to ride high in the sky,
Till sun makes the whole ocean dry.

I know what i am writing is all waste,
But after all everyone has his own taste,
you better do your job right,
Then reading the crap i write.

- गजेंद्र "स्थिरप्रग्य" सिडाना